हरेला: प्रकृति, परंपरा और विज्ञान का अद्भुत संगम
हरेला: प्रकृति, परंपरा और विज्ञान का अद्भुत संगम
हर साल पर्यावरण संरक्षण के नाम पर लाखों पौधे लगाए जाते हैं। तस्वीरें खिंचती
हैं, अभियान चलते हैं और कुछ दिनों तक इसकी खूब
चर्चा भी होती है। लेकिन कुछ महीनों बाद अगर उन्हीं जगहों पर जाकर देखा जाए,
तो अधिकांश पौधे नजर ही नहीं आते। ऐसे में यह
बुनियादी सवाल उठना स्वाभाविक है कि पर्यावरण बचाने का मतलब सिर्फ पौधे लगाना है,
या उन्हें जीवित रखना भी उतना ही जरूरी है?
यहीं पर उत्तराखंड का पारंपरिक पर्व हरेला एक
अनूठी सोच के साथ सामने आता है। पहली नजर में यह एक सांस्कृतिक और धार्मिक उत्सव
लग सकता है, लेकिन इसके पीछे प्रकृति
के चक्र को समझने की गहरी समझ छिपी है। यही कारण है कि आज इसे पारंपरिक
पारिस्थितिक ज्ञान (Traditional Ecological Knowledge) का एक उत्कृष्ट उदाहरण माना जाता है।
रोपण का सही समय और मानसूनी नमी का विज्ञान
वृक्षारोपण की सफलता केवल लगाए गए पौधों की संख्या से तय नहीं होती। किसी भी पौधे के जीवित रहने की दर (Survival Rate) में स्थानीय सूक्ष्म-जलवायु (Microclimate), मिट्टी की नमी और रोपण का सही समय महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। वन विज्ञान के सिद्धांत भी बताते हैं कि यदि पौधों को शुरुआती दिनों में पर्याप्त नमी और अनुकूल वातावरण मिल जाए, तो उनकी जड़ों को तेजी से स्थापित (Root Establishment) होने का अवसर मिलता है। जुलाई के मध्य में मनाया जाने वाला हरेला इसी प्राकृतिक अनुकूलता का समय है। इस अवधि तक मानसून पर्वतीय क्षेत्रों में सामान्यतः सक्रिय हो चुका होता है। लगातार वर्षा के कारण मिट्टी में पौधों की वृद्धि के लिए पर्याप्त नमी बनी रहती है। साथ ही, वातावरण में अधिक आर्द्रता (Humidity) होने से नए पौधों पर जल की कमी का दबाव कम पड़ता है। हमारे पूर्वजों ने बिना आधुनिक उपकरणों के मौसम के इस चक्र को समझा और वृक्षारोपण के लिए वही समय चुना, जब प्राकृतिक परिस्थितियाँ पौधों की प्रारंभिक वृद्धि के लिए सबसे अधिक अनुकूल होती हैं।
लोककथा, आस्था और प्रकृति का रिश्ता
उत्तराखंड के लोकजीवन में हरेला केवल एक पर्व
नहीं, बल्कि हरियाली, समृद्धि और नए जीवन की शुरुआत का प्रतीक है। लोकमान्यता है कि सावन के आगमन से
पहले घरों में पाँच, सात या नौ प्रकार के अनाज बोए जाते हैं। कुछ दिनों बाद जब इन बीजों से कोमल
हरे अंकुर निकलते हैं, तो उन्हें शुभता, उर्वरता और आने वाले अच्छे कृषि वर्ष का संकेत
माना जाता है। हरेला काटकर सबसे पहले देवस्थल में अर्पित किया जाता है, फिर परिवार के
बड़े-बुज़ुर्ग इसे घर के सदस्यों के सिर पर रखकर सुख, समृद्धि और दीर्घायु का
आशीर्वाद देते हैं। यह परंपरा केवल धार्मिक अनुष्ठान नहीं है, बल्कि पीढ़ियों से प्रकृति
के प्रति सम्मान, खेती-किसानी से जुड़ाव और परिवार व समाज के बीच आत्मीयता को जीवित रखने का
माध्यम भी रही है। शायद यही कारण है कि उत्तराखंड में हरेला आज भी केवल कैलेंडर पर
दर्ज एक त्योहार नहीं, बल्कि प्रकृति के साथ भावनात्मक रिश्ते का जीवंत उत्सव माना
जाता है।
कृषि-विज्ञान और सामुदायिक संरक्षण
हरेला की विशेषता केवल वृक्षारोपण तक सीमित नहीं है। इस पर्व से नौ दिन पहले
घरों में टोकरियों या पात्रों में पाँच या सात प्रकार के अनाज बोए जाते हैं और
उनके अंकुरण का अवलोकन किया जाता है। इसे बीजों की अंकुरण क्षमता तथा कृषि चक्र से
जुड़ी पारंपरिक समझ का प्रतीक भी माना जाता है। यह परंपरा दर्शाती है कि हमारे
लोकजीवन में प्रकृति और कृषि के अनुभवों को सांस्कृतिक परंपराओं के माध्यम से
पीढ़ी-दर-पीढ़ी संरक्षित किया गया। इसके साथ ही, इस पर्व की सबसे बड़ी खूबी इसकी सामुदायिक भावना है। जब पर्यावरण संरक्षण किसी
सरकारी कार्यक्रम या औपचारिकता के बजाय समाज की लोक-परंपरा का हिस्सा बन जाता है,
तो पौधों की देखभाल की जिम्मेदारी भी स्वाभाविक
रूप से लोगों में बँट जाती है। यही सामूहिक भागीदारी इसे केवल एक आयोजन नहीं,
बल्कि संरक्षण की संस्कृति बनाती है।
निष्कर्ष
आज जब पूरी दुनिया जलवायु परिवर्तन और घटते हरित आवरण (Green Cover) जैसी गंभीर चुनौतियों का सामना कर रही है, तब आधुनिक विज्ञान और स्थानीय पारंपरिक ज्ञान का समन्वय
पहले से कहीं अधिक प्रासंगिक हो गया है। हरेला हमें यह संदेश देता है कि
वृक्षारोपण की योजना हमेशा स्थानीय मौसम और पारिस्थितिक परिस्थितियों के अनुरूप
बनाई जानी चाहिए। पेड़ लगाना आसान है, लेकिन उसे वृक्ष
बनने तक सुरक्षित और पोषित रखना ही वास्तविक जिम्मेदारी है। जब परंपरा, समाज और विज्ञान एक साथ चलते हैं, तब पर्यावरण संरक्षण केवल एक वार्षिक अभियान नहीं रहता,
बल्कि जीवन का स्वाभाविक हिस्सा बन जाता है।
-रोहिन्द्र सिंहशोधार्थी (पर्यावरण विज्ञान)उत्तराखंड मुक्त विश्वविद्यालय, हल्द्वानी, नैनीताल


Truly commendable🫡
ReplyDeleteGood Insight...
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